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गुरुवार, ३० सप्टेंबर, २०१०

नसीर-फैझ

काही म्हणण्यास, त्यांना मनास क्लेश असेच...
जे म्हणण्याचे होते..
म्हणण्यास नाही उरले असेच....

मी ठरलो अनोळखी कित्येक......

-फैझ.

अदावतें थी तगाफुल था रंजिशें थी मगर                                                 
बिछड़ने वाले में सब कुछ था बेवफाई न थी                                             

एक एक अदा होती, रसिकता होती हुरहूर होती पण
निघून जाणारा मध्ये सारे काही होते, अप्रामाणिकता नव्हती

बिछड़ते वक़्त उन आँखों में थी हमारी ग़ज़ल                                           
ग़ज़ल भी वो जो किसी को अभी सुनाई न थी             

निघण्याच्या वेळी त्या डोळ्यात होती माझी गझल
गझल ही ती जी कुणाला अजून ऐकवली नव्हती



नसीर

बुधवार, ७ ऑक्टोबर, २००९

फैज़


नाही दृष्टीत ध्येय तर जिज्ञासाच बरी
नाही मिलन शक्य तर इच्छा ही बरी...

ना शरीरात रक्त संघटीत न अश्रू नयनात
'नमाजा'ला हौसच अनिवार्य आहे, तर अनुपस्थितीही बरी

कश्याप्रकारे तरी जमवलेल्या सभेत मधुशाले वाले
नाही जे वचन हो मद्यचषकाच, तर बेधुंदीही बरी..

जर प्रतीक्षा कठीण आहे तर जोपर्यंत ए हृदया..
कुणाच्या संकल्पांच्या व्यापांची बातचीतही बरी..

कालप्रवाहाच्या प्रतिद्वंदात परिचित जरी नाही कोणी
तर फ़ैज़ चर्चा स्वदेशची आपल्या सन्मुखही बरी


- फैज़

शुक्रवार, १० जुलै, २००९

नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू सही
नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू सही....
नहीं मिसाल मय असर तो आरजू ही सही..

नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू सही....
नहीं मिसाल मय असर तो आरजू ही सही..

नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू सही....

न तन में खून फराहम न अश्क आँखों में
न तन में खून फराहम न अश्क आँखों में
नमाजे शौक को वाजीब है बेहुजुर सही...
नमाजे शौक को वाजीब है बेहुजुर सही...
नहीं मिसाल मय असर तो आरजू ही सही

नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू सही....

किसी तरह तो जमे बज्म मयकदे वालों
किसी तरह तो जमे बज्म मयकदे वालों
नहीं जो वादा ओ सागर तो हावू ही सही
नहीं जो वादा ओ सागर तो हावू ही सही
नहीं मिसाल मय असर तो आरजू ही सही

नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू सही....
नहीं मिसाल मय असर तो आरजू ही सही
नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू सही....
नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू सही....

गर इन्तेजार कठिन है तो जब तलक ऐ दिल
गर इन्तेजार कठिन है तो जब तलक ऐ दिल
किसी के वादे ऐ फर्दा की गुफ्तगू ही सही
किसी के वादे ऐ फर्दा की गुफ्तगू ही सही......
नहीं मिसाल मय असर तो आरजू ही सही

नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू सही....
नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू सही....

दयार गैर में महरम अगर नहीं कोई
दयार गैर में महरम अगर नहीं कोई
तो फैज़ जिक्र वतन अपने रूबरू ही सही
तो फैज़ जिक्र वतन अपने रूबरू ही सही ...
नहीं मिसाल मय असर तो आरजू ही सही

नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू सही....
नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू सही....
नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू सही....
नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू सही....
नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू सही....

- फैज़
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